Saturday, November 27, 2010

दो लघु गीत 
गलत जगह मैं अपने गीत सुना आया
उस दिन यारों बहुत रात भर पछताया |


गलत जगह क्या ,
पथरीलें चेहरों का जमघट था | 
शब्दों की बलिवेदी ,
भावों का बधस्थल ,
अर्थों  का मरघट था | 
जहाँ चाहिए था मुजरा मैं वहां आरती गा आया | 
उस दिन यारों बहुत रात भर पछताया |

                     - २-
शाम से पढ़ कर तुम्हारा ख़त | 
भावनाएं हैं बहुत आहत |

दोस्त तुमने दोस्ती के खेत को  ,
स्वार्थ से सींचा कपट को वो दिया | 
मित्र कैसे मित्र हो दे कर दगा ,
विश्वास का अनमोल मोती खो दिया | 
उम्र भर बढ़ती रही जो प्यास सी | 
मर गयी अब मित्र वह चाहत | 
भावनाएं हैं बहुत आहत |
                       कवि सुशील दीक्षित विचित्र 

           

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