Sunday, December 11, 2016

वो क्या शय है

वो क्या शय है
जो महफ़िल में दिलों को गुदगुदाता है
मगर जब रात आती है ग़मों में डूब जाता है
वो क्या शय है

वो क्या शय है
जो पीर की किताब पुख्ता है
घाव  इतने हैं की पोर पोर दुखता है
लेकिन जहां मिलता है
खुल के मुस्कराता है
गीत गाता है कभी कभी गजल गाता है
भीड़ में रह कर जो तन्हाई से ऊब जाता है
 वो क्या शय है ।

Saturday, December 3, 2016

अब तो केवल फेसबुकों पर मिलना होता है


बहुत दिनों  बाद एक सामाजिक सरोकार का गीत  प्रस्तुत है

जो पहले मिलने को हरदम रहते थे आतुर
अब तो केवल  फेसबुकों पर मिलना होता है

 रोज मिला करते थे, फिर भी घंटो  बतियाते
मिलते ही हम तुम दोनों फूलों से खिल जाते
मुरझाये फूलों का भी क्या खिलना होता है ?
अब तो केवल फेसबुकों पर मिलना होता है ।

 लाइक, डिसलाइक,  कमेंट तक सीमित बातें हैं
नई पोस्ट से जुड़े हुए सब रिश्ते नाते हैं
मन बेचारे को कर्सर सा हिलना होता है
उनसे अब तो फेसबुकों पर मिलना होता है

                     सुशील दीक्षित विचित्र