Thursday, April 5, 2012

तुमने ही तोड़ दी कसम,
मैंने तो कुछ नहीं कहा
प्यार एक भरम मात्र है , सब को यह ठीक से पता
फिर भी जब प्रेम उमड़ता ,वृक्षों से लिपटती लता
तुमने जब मिटा दिए भरम ,मैंने तब क्या नहीं सहा

प्यार खेल भरे पेट का , प्यार शीत घाम का सफ़र
प्यार महज ख़ूबसूरत लफ्ज , प्यार सिर्फ धोखे का घर
आंसू को लाज ना शरम ,आंसू का काम था , वहा
कुमार  विचित्र  

Monday, April 2, 2012


लोकगीत वाले  पनघट वीराने मंजर लगते हैं 
फसलें जहां झूमती रहती , खेत वे बंजर लगते हैं   
धीरे धीरे बाग़ कटे , तालाब पटे ,नदियाँ  सूखीं
ककडी खीरे वाली बेलों में अब खंजर लगतें हैं
                                                               सुशील विचित्र 

Thursday, March 8, 2012


काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो 
मंहगाई में कजरी विसरी,भूले हंसी ठिठोली हो

खोया भैया चढो ताड़ पर, गुझियाँ भई अमोल 
एक अकेले कमवैया की ,जेबन माँ सउ झोल
फागुन की मस्ती सब उतरी ,चढ़ई न भंग की गोली हो 
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो 

गेहूं बेचि के करजा पाटो, पास बचो नहिं धेला
पड़ो कबीर गुमसुम घर मा,सूनो डारो मेला
जैसे के तैसे घर लइ आओ ,अपने पान तमोली हो
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो

ऊपर ऊपर डारि रहे रंग .अन्दर को मन कोरो
जगत भंवर मा हमई फांसि के डुको नन्द को छोरो
करइ नरेगा मा मजदूरी गोपी भोली हो
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो
सुशील विचित्र
 मित्रता के लिए धन्यवाद 


आप की पूरी सभी हों कामनाएं 
हम विधाता से सदा यह ही मनाएं 
जिन्दगी में रंग खुशियों के भरें 
आज होली पर यही शुभकामनाएं 

Monday, March 5, 2012

रोज रोज कोई दिल लगाना नहीं होता
दिलो के तार न छेड़े वो गाना नहीं होता
जन्म जन्मों का नाता जब रिसे रिश्ता तभी होता
पलों में टूट जाये जो वो याराना नहीं होता  

  

Sunday, March 4, 2012

एक  अधूरा गीत लिखा है
तुम आओ पूरा हो जाये
तृप्ति लिखा है , प्यास लिखा है
पतझर संग मधुमास लिखा है
दुःख की घनी बस्तियां लिख दीं
खुशियों को वनवास लिखा है
ऐसा चाह रहा कुछ लिखना
सदियों सदियों हर युग गाये

सुशील विचित्र 

Saturday, March 3, 2012

खुली हथेली पर सूरज रख वह निकला जबसे
स्याह अँधेरे तहखानों में कैद हुए तब से
जाम सुराही हाला साक़ी सावन की रातें
यह सब जिसको हासिल हो वह क्या मांगे रब से
हंस कर दर्द न पीना सीखा पीकर दर्द न मुस्काया
ऐसे  को  निष्काषित करदो इश्क के मकतब से

सुशील विचित्र 

Friday, March 2, 2012

मेरे अन्दर एक नदी ,फिर------


मेरे अन्दर एक नदी ,फिर
नदी किनारे मैं क्यों जाऊं


मुक्त कल्पना की आखों में , सौ सौ चित्र उतर आतें हैं
 उनसे बतियाओ तो उन में , रंग स्वयं ही भर जाते हैं
प्रकृति हमारी जब साथी है ,फिर क्यों गीत तुम्हारे गाऊं
मेरे अन्दर एक नदी ,फिर ---------------------

पूर्ण काम, निष्काम न कोई , यहाँ काम की थाह नहीं है
और काम से बच कर निकले ,ऐसी कोई राह नहीं  है
काम सभी के आना , फिर क्यूँ केवल काम तुम्हारे आऊं
मेरे अन्दर एक नदी , फिर , नदी किनारे मैं क्यूँ जाऊं
                                                             
                                                                 सुशील विचित्र 

Friday, February 10, 2012

सिर्फ अपने दिखें मत विरानें दिखें 
सिर्फ गुलशन दिखे न वीराने दिखें
बंद पलकों पे डेरा पड़े नीद का 
और सपने दिखें तो सुहानें दिखें  

धुप अंधेरों मैं था खड़ा 
चाह पाले कई चाह में
आस विश्वास की लौ जली 
रोशनी हो गई राह में 
                नेह की चांदनी यूँ झरी 
                भीगता मन हमारा रहा
सेहरा सेहरा खिले फूल फिर,
वादियाँ गुनगुनानें लगीं 
थक के ऊँघी नदी को हवा 
लोरियां गा सुलाने लगीं  

Wednesday, February 8, 2012

.........तब चले जाना



कुछ गजल कुछ गीत की बातें 
दोस्त कर लें तब चले जाना 

दूर तक फैला समुन्दर है ,   
पर  समुन्दर से बड़ी उलझन हमारी 
धूप कहती साथ हम तुम्हारा ,
चांदनी पर बन गयी दुश्मन हमारी

नीति की कुछ रीति की बातें 
कहर कर दें तब चले जाना 

क्षितिज के उस पर तक है धुंध 
धुंध में गुम हो गया है प्यार का चेहरा
और चेहरे  पर मकड़िया बुन रहीं जाला
वेदना का हो गया रंग और भी गहरा 

प्रेम की कुछ प्रीति की बातें 
जहर भर दें तब चले जाना   
कुछ गजल कुछ गीत की बातें ....... 

Sunday, January 22, 2012

आ गयीं कैसी हवाएं आ गयीं

आ गयीं , कैसी हवाएं आ गयीं 

शीत की पढ़तीं ऋचाएं आ गयीं  
आ गयीं  कैसी हवाएं आ गयीं

यह जमा सकतीं शिराएँ  हैं  संभल कर
यह नशीली यातनाएं हैं  संभल कर 
बर्फ  के खंजर उठाये घूमतीं हैं 
यह हिमालय की सुताएं हैं संभल कर 
डाल कर कोहरे की चादर सूर्य पर   
आ गयीं यह बिन बुलाये आ गयीं  
आ गयीं कैसी हवाएं आ गयीं

इन हवाओं का कहर पर   झेलना है
कपकपाता एक डर पर  झेलना है
हैं ठिठुरती रात  भर रातें , दिशाएँ
फ्रिज हुआ  सारा शहर पर  झेलना है

रीति इन पागल हवाओं की पुरानी
तोड़तीं सब वर्जनाएं आ  गयीं
आगयी कैसी हवाएँ आ  गयीं