Sunday, November 14, 2010

etihas ke khilaf

कुंठा कि ढाल से वित्रष्नाओं कर प्रहार को
रोंक तो सकते हो 
मगर रग -रग में बहते हुए ज्वालामुखी को कैसे 
रोंके पाओ गे /
उपवन में फूलों की भीड़ की ओर
कीड़े भी आकर्षित हो जाते हैं 
मानव की तो बात ही क्या है 
काटों की ओर कोई नजर  नहीं फेंकता 
नींव में गड़ा पत्थर कोई नहीं देखता /
ताजमहल की चर्चा हर कोई करता है 
मगर बाइस हजार कटे
हाथ बाले मजदूरों की चर्चा आज तक किसने की /
चुप रहो इतिहास के कान होते हैं  
वह बदगुमानी बर्दाश्त नहीं कर सकता 
अपने बनाये आदर्शों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुन सकता 
ऐसी बकवास करने बालों की 
उसने जीभें काटली हैं /
मगर हम हम्मीर हठी हैं 
उसको झुकना पड़ेगा 
इतिहास को सोने के सिंहासन से उतर कर नंगे पांव 
होरी की झोपडी में घुसना पड़ेगा /
कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले 
बनावटी विकास के पन्नों पर कालिख पोत कर 
उनके स्थान पर भूख से विलखते बच्चों  के रेखाचित्र खींच कर 
कुतुबमीनार की अंतिम मंजिल पर टांग दो 
साथ में इतिहास को उल्टा बाँध दो 
ताकि हमारे आदरणीय राजा उधर से गुजरें तो देखें 
कि अधबुझी आखों वाली जनता की आखों में 
सूरज का तेज उतर आया है 
अब चाहे इतिहास उसे भला कहे या बुरा 
अब उसका झंडा न झुकेगा 
न टूटेगा 
वरन उनके सिर पर वज्र बन कर गिरेगा
जो लाशों का ताज पहन कर इठलाते हैं
                कवि सुशील दीक्षित विचित्र                           

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