बहुत दिनों के बाद याद आई है
बहुत दिनों के बाद याद आई है ,
ढेरों ले उन्माद याद आई है |
याद कि जैसे हवा बदरिया ले आई है ,
या कि फूल पर तितली इठलाई है |
याद कि जैसे जल से उछले सोंन मछरिया ,
याद कि जैसे नभ से किरन उतर आई है |
याद कि जैसे टेसू फूल उठें जंगल में ,
याद अचानक ढूंढ याद लाई है |
बहुत दिनों के बाद याद आई है |
बहुत दिनों से जग के फेरे में उलझा था ,
बहुत दिनों से तेरे मेरे में उलझा था |
इतनी उलझन स्वयं उलझनें उलझ गयीं थीं ,
बहुत दिनों से सांप सपेरे में उलझा था |
उत्तर गमले में उगते यादों के जंगल ,
कहाँ करूँ फ़रियाद याद आई है |
बहुत दिनों के याद आई है |
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
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