Sunday, December 5, 2010

बहुत दिनों के बाद याद आई है 

बहुत दिनों के बाद याद आई है ,
ढेरों ले उन्माद याद आई है |

याद कि जैसे हवा बदरिया ले आई है ,
या कि फूल  पर तितली इठलाई है |
याद कि जैसे जल से उछले सोंन मछरिया ,
याद कि जैसे नभ से किरन उतर आई है |
याद कि जैसे टेसू फूल उठें जंगल में ,
याद अचानक ढूंढ याद लाई है |  
बहुत दिनों के बाद याद आई है |

बहुत दिनों से जग के फेरे में उलझा था ,
बहुत दिनों से तेरे मेरे में उलझा था |
इतनी उलझन स्वयं उलझनें उलझ गयीं थीं ,
बहुत दिनों से सांप सपेरे में उलझा था |
उत्तर गमले में उगते यादों के जंगल , 
कहाँ करूँ फ़रियाद याद आई है |
बहुत दिनों के याद आई है | 
                कवि सुशील दीक्षित विचित्र 
                     




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