Thursday, April 5, 2012

तुमने ही तोड़ दी कसम,
मैंने तो कुछ नहीं कहा
प्यार एक भरम मात्र है , सब को यह ठीक से पता
फिर भी जब प्रेम उमड़ता ,वृक्षों से लिपटती लता
तुमने जब मिटा दिए भरम ,मैंने तब क्या नहीं सहा

प्यार खेल भरे पेट का , प्यार शीत घाम का सफ़र
प्यार महज ख़ूबसूरत लफ्ज , प्यार सिर्फ धोखे का घर
आंसू को लाज ना शरम ,आंसू का काम था , वहा
कुमार  विचित्र  

Monday, April 2, 2012


लोकगीत वाले  पनघट वीराने मंजर लगते हैं 
फसलें जहां झूमती रहती , खेत वे बंजर लगते हैं   
धीरे धीरे बाग़ कटे , तालाब पटे ,नदियाँ  सूखीं
ककडी खीरे वाली बेलों में अब खंजर लगतें हैं
                                                               सुशील विचित्र