दो लघु गीत
गलत जगह मैं अपने गीत सुना आया
उस दिन यारों बहुत रात भर पछताया |
गलत जगह क्या ,
पथरीलें चेहरों का जमघट था |
शब्दों की बलिवेदी ,
भावों का बधस्थल ,
अर्थों का मरघट था |
जहाँ चाहिए था मुजरा मैं वहां आरती गा आया |
उस दिन यारों बहुत रात भर पछताया |
- २-
शाम से पढ़ कर तुम्हारा ख़त |
भावनाएं हैं बहुत आहत |
दोस्त तुमने दोस्ती के खेत को ,
स्वार्थ से सींचा कपट को वो दिया |
मित्र कैसे मित्र हो दे कर दगा ,
विश्वास का अनमोल मोती खो दिया |
उम्र भर बढ़ती रही जो प्यास सी |
मर गयी अब मित्र वह चाहत |
भावनाएं हैं बहुत आहत |
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
कवि सुशील दीक्षित विचित्र