Saturday, November 27, 2010

दो लघु गीत 
गलत जगह मैं अपने गीत सुना आया
उस दिन यारों बहुत रात भर पछताया |


गलत जगह क्या ,
पथरीलें चेहरों का जमघट था | 
शब्दों की बलिवेदी ,
भावों का बधस्थल ,
अर्थों  का मरघट था | 
जहाँ चाहिए था मुजरा मैं वहां आरती गा आया | 
उस दिन यारों बहुत रात भर पछताया |

                     - २-
शाम से पढ़ कर तुम्हारा ख़त | 
भावनाएं हैं बहुत आहत |

दोस्त तुमने दोस्ती के खेत को  ,
स्वार्थ से सींचा कपट को वो दिया | 
मित्र कैसे मित्र हो दे कर दगा ,
विश्वास का अनमोल मोती खो दिया | 
उम्र भर बढ़ती रही जो प्यास सी | 
मर गयी अब मित्र वह चाहत | 
भावनाएं हैं बहुत आहत |
                       कवि सुशील दीक्षित विचित्र 

           

Thursday, November 25, 2010

तीन लघु गीत 
             
            (1)
उजली सी दीवारों पर 
भद्दे से इश्तहार हैं |

ईंट ईंट सिल्हाई है ,
दरकीं सब दीवारें हैं |
इंच इंच घाव हैं नए 
पोर पोर अंगारें हैं |

कौन किस की सहलाये चोट ,
सब के सब व्यंगकार हैं |  
उजली सी दीवारों पर ,
भद्दे  से इश्तहार हैं |

             (2)
चंदा के गलियारे में 
फिर दिन का खून हो गया 
कोई भी खलबली नहीं 
कोई भी सनसनी नहीं 

लोहे की द्रढ़ बग्घी में , 
सब कागज के घोड़े हैं |
सोंच रहा राष्ट्र सारथी , 
अब दौड़े अब दौड़े  हैं |
लेकिन वे दौड़ेंगे कैसे , 
गति से तो दुश्मनी रही |
         ( 3 ) 
खून रंगी सड़कों के ,
 निर्वसन किनारों पर , 
छाप दो इश्तहार 
आज बंद बाजार है ,
यह  शहर बीमार है |

उगती है बर्फ यहाँ 
आग नहीं पलती है 
सोनें की लंका में सोने की चलती है 
धोखा हैं छल हैं
सारे ये आश्वासन 
सुग्रीव की सांसों में वासना मचलती है 
कौन किसकी सुनता है ,
काल शीश धुनता है,
ईश   भी लाचार है |
यह शहर बीमार है |
             कवि सुशील  दीक्षित विचित्र 
        









Thursday, November 18, 2010

घर से चिठिया एक आई है

घर से चिठिया एक आई है 

घर से चिठिया एक आई है ,
अम्मा ने कुशल क्षेम मंगाई है |

लिखती हैं पाला  सारी फसल लूट गया ,
इसी करण पारो का बंधा रिश्ता टूट गया |
श्यामा गाय अपनी अब दूध नहीं देती है ,
ऊपर   से   दूना    चारा   खा   लेती   है  |
जीने की अब तो बस होती रश्म अदाई है|
घर से चिठिया  एक आई  है,
अम्मा  ने कुशल- क्षेम मंगाई है | 


बापू को दमा का ज्वार फिर चढ़ आया , 
पखवाड़ा बीत गया दाना तक नहीं खाया |
ऊपर से पीने  को दूध नहीं मिलता है 
अपना तो जीवन यह कण-कण कर  गलता |
भेज देना लल्ला लिखी जो दवाई है |
घर से चिठिया  एक आयी है |
अम्मा ने कुशल-क्षेम मंगाई है|
                   कवि  सुशील दीक्षित विचित्र  

Monday, November 15, 2010

sare kyon saj band hain

 हर कोई सो गया यहाँ
 सारे क्यों साज  बंद हैं
 लड़ने को काल  से चला
 कोई भी साथ नहीं है |
 अपने ही एकाकी सर पर
अपना ही हाथ नहीं हैं

कानों में बात का जहर
आखों में भरी धुंध है        

सारे क्यों साज बंद हैं

नफरतें दहेज़ में मिलीं
टूटन संग ब्याह हो गया
यादों की हाट जब लगी
सुख का परिवार खो गया

कैसे मैं गीत को लिखूं
बागी सब हुए छंद हैं
सारे क्यों साज बंद है |
 
                    कवि सुशील दीक्षित विचित्र 

Sunday, November 14, 2010

vicharprvah: कहिये तो घर पर सब ठीकठाक है  चाचा की ताऊ से बोलचाल...

vicharprvah: कहिये तो घर पर सब ठीकठाक है
चाचा की ताऊ से बोलचाल...
: "कहिये तो घर पर सब ठीकठाक है चाचा की ताऊ से बोलचाल है भाई की भाभी से उतनी ही पटती है बहुओं की बातों से सासू क्यों खटती है बिंदिया के ..."

etihas ke khilaf

कुंठा कि ढाल से वित्रष्नाओं कर प्रहार को
रोंक तो सकते हो 
मगर रग -रग में बहते हुए ज्वालामुखी को कैसे 
रोंके पाओ गे /
उपवन में फूलों की भीड़ की ओर
कीड़े भी आकर्षित हो जाते हैं 
मानव की तो बात ही क्या है 
काटों की ओर कोई नजर  नहीं फेंकता 
नींव में गड़ा पत्थर कोई नहीं देखता /
ताजमहल की चर्चा हर कोई करता है 
मगर बाइस हजार कटे
हाथ बाले मजदूरों की चर्चा आज तक किसने की /
चुप रहो इतिहास के कान होते हैं  
वह बदगुमानी बर्दाश्त नहीं कर सकता 
अपने बनाये आदर्शों के खिलाफ एक भी शब्द नहीं सुन सकता 
ऐसी बकवास करने बालों की 
उसने जीभें काटली हैं /
मगर हम हम्मीर हठी हैं 
उसको झुकना पड़ेगा 
इतिहास को सोने के सिंहासन से उतर कर नंगे पांव 
होरी की झोपडी में घुसना पड़ेगा /
कश्मीर से कन्याकुमारी तक फैले 
बनावटी विकास के पन्नों पर कालिख पोत कर 
उनके स्थान पर भूख से विलखते बच्चों  के रेखाचित्र खींच कर 
कुतुबमीनार की अंतिम मंजिल पर टांग दो 
साथ में इतिहास को उल्टा बाँध दो 
ताकि हमारे आदरणीय राजा उधर से गुजरें तो देखें 
कि अधबुझी आखों वाली जनता की आखों में 
सूरज का तेज उतर आया है 
अब चाहे इतिहास उसे भला कहे या बुरा 
अब उसका झंडा न झुकेगा 
न टूटेगा 
वरन उनके सिर पर वज्र बन कर गिरेगा
जो लाशों का ताज पहन कर इठलाते हैं
                कवि सुशील दीक्षित विचित्र                           
धर्मनिरपेक्षता की नंगी दुहाई     

आओ
धर्मनिरपेक्षता की नंगी दुहाई देकर
इतिहास की आँख में डंडा करे |

जो तिलक लगाते हैं 
चोटी रखते हैं 
जो विश्ववन्धुत्व के देखते हैं  ख्वाब
जो विश्व को देते रहे हैं हमेशा ज्ञान 
जो गढ़ते हैं  
उद्दांत भावना की मजबूत छेनी से 
ऐश्वर्यशाली भारत की तस्वीर 
घोर साम्प्रदायिक हैं, 
गाँधी के हत्यारे हैं , 
और जो रख रहे हैं एक और विभाजन की नींव
तोड़ रहे हैं समाज 
कुतर्को की कुल्हाडी से काट रहे हैं सभ्यता की तुलसी 
वे हमें जान से भी प्यारे हैं
फिर भले वे देश के हत्यारे हैं  

 आओ
 धर्मनिर्पेक्षता की  नंगी दुहाई दे कर
 सत्य की आंख में डंडा करे   
आओ, भेड़ो को बताएँ कि
कटना उनका कर्तव्य है 
इसलिए जिन्दा रहने की मांग करना 
साम्प्रदायिकता होगी ,
आओ , भेड़ो को पंचशील का पाठ पढ़ायें  
कि वे बहुसंख्यक हैं 
भेड़िये अल्पसंख्यक हैं 
इसलिए वे भेड़ियो का विशेष ध्यान रखें 
भेड़िये भले ही उनके बच्चो को खा जाएँ 
मगर भेड़ो को चाहिए 
कि भेड़ियों की धार्मिक भावना को ठेस न लगने पाए /
क्योंकि भेड़ों 
और भेड़ियों के बीच कुछ इस तरह का भाईचारा है 
कि भेड़िये भेड़ो के भाई हैं
भेड़ें भेड़ियों का चारा हैं /

 आओ,
 धर्म निरपेक्षता की पाखंडी दुहाई देकर 
लोकतंत्र की आँख में डंडा करें /
आओ भेड़ो को अहिंसा का महत्व समझाएं 
उन्हें पुरजोर ढंग से ज्ञान दें
कि भेड़िये यदि उनका संविधान नहीं मानते हैं तो इसमें भेड़ो का दोष हैं /
उन्हें भेड़ियों के सुर में सुर मिलाना था
और अपना संविधान भेड़ियों के अनुकूल बनाना था
जिसमे जंगल के हर संसाधन पर
हर सुविधा पर भेड़ियों का पहला और अंतिम अधिकार होता
और भेड़ो के पास जंगल बचाने के कर्त्तव्य का भार होता /
फिर भी भेड़ें यदि भेड़ियों के सींग मारती हैं
तो यह हिंसा होगी /
अलबत्ता भेड़िया उनके परिवार का एक सदस्य खाता है
और उसका पेट नहीं भरता
तो भेड़ों को उसके लिए दूसरे सदस्य का इन्तजाम करना होगा
भले ही भेड़ों का अस्तित्व मिट जाये
सहअस्तित्व की रक्षा के लिए उनको ही काम करना होगा /

                           कवि सुशील दीक्षित विचित्र     



Saturday, November 13, 2010

कहिये तो घर पर सब ठीकठाक है 


कहिये तो घर पर सब ठीकठाक है ? 
चाचा की ताऊ से बोलचाल है ?   

 भाई  की भाभी से उतनी ही  पटती  है ? 
बहुओं की बातों से सासू क्यों खटती है ?
बिंदिया के रिश्ते की बात कहीं और चली ? 
कैसी अब लगती है सोनू की चोर लली ?


मामा का कर्ज सारा वेबाक है ?
कहिये तो घर पर सब ठीकठाक है ?      

बाबा की  गठिया का दर्द अब कैसा है ?
साहू का ईमान धर्म क्या अब भी पैसा है ?
 बडकू का लड़का क्या वैसा ही नटखट है ?  
 ननद और भौजाई  में वैसी ही खटपट है ?

 मोहन की लाठी में वही धाक है |  
कहिये तो घर पर सब  ठीकठाक है ?

छोटे ने आमों का बाग जो लगवाया ,
एक अरसा बीत गया बौर तक नहीं आया ? 
आमों की छोडो अब कोई बात और कहो | 
गाँव की नदियाँ में थोड़ी देर और बहो |

अपने गाँव शेष अभी छूतपाक है !
कहिये तो घर पर सब ठीकठाक है |
             कवि सुशील दीक्षित विचित्र