Friday, May 26, 2017

चलो 

वन्देमातरम

यह पोस्ट किसी के समर्थन या विरोध में नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य वन्देमातरम का क्रमबद्ध इतिहास सामने लाना है |वन्देमातरम की रचना लोकप्रियता और विवाद का अपना अलग इतिहास है |सन् १८७०-८० के दशक में ब्रिटिश शासकों ने सरकारी समारोहों में ‘गॉड! सेव द क्वीन’ गीत गाया जाना अनिवार्य कर दिया था। अंग्रेजों के इस आदेश से बंकिमचन्द्र चटर्जी को, जो उन दिनों डिप्टी कलेक्टर थे, बहुत ठेस पहुँची और उन्होंने १८७६ में इसके विकल्प के तौर पर संस्कृत और बाँग्ला के मिश्रण से एक नये गीत की रचना की और उसका शीर्षक दिया - ‘वन्दे मातरम्’। शुरुआत में इसके केवल दो ही पद रचे गये थे जो संस्कृत में थे। इन दोनों पदों में केवल मातृभूमि की वन्दना थी। बाद में तीन पद और लिखे गए जो कि विशुद्ध बंगला में थे |उन्होंने १८८२ में जब बाँग्ला उपन्यास आनन्द मठ लिखा तब इसे भी उसमें शामिल कर लिया। सन् १८९६ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने यह गीत गाया। सन् १९०१ में कलकत्ता में हुए कांग्रेस के एक अन्य अधिवेशन में श्री चरणदास ने यह गीत पुनः गाया। सन् १९०५ के बनारस अधिवेशन में इस गीत को सरलादेवी चौधरानी ने गाया | सन् १९०५ में अंग्रेजी सरकार ने बंगाल को विभाजित करने की घोषणा की | इस का भारी विरोध हुआ और वंदेमातरम् बंगाल की सीमाएं तोड़ कर पहली बार देश का युद्ध गीत बन गया | हिंदु, मुसलमान सभी ‘वन्दे मातरम्’ का उदघोष करते हुए सडकों पर उतर आये | कितने ही क्रांतिकारी ‘वन्दे मातरम्’ का उदघोष करते हुए फांसी के फंदे पर चढ़ गए या गोली से मारे गए | इसकी लोकप्रियता से डर कर अंग्रेजों ने आनंद मठ के साथ ही इस गीत पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया लेकिन तब तक आजादी के दीवानों का यह गीत निर्विवाद मूल मन्त्र बन चुका था | कांग्रेस के अधिवेशनों में यह प्रमुखता से गाया जाने लगा | 1920 तक विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनूदित होकर यह राष्ट्रीय हैसियत पा चुका था। इस गीत पर विवाद १९२३ में कांग्रेस के काकीनाडा सम्मलेन से शुरू हुआ | तब कांग्रेस के अध्यक्ष मौलाना मोहम्मद अली थे | कांग्रेस की पुरानी परंपरा के अनुसार विष्णु दिगंबर पलुस्कर गीत गाने के लिए जैसे ही मंच पर पहुंचे अध्यक्ष मोहम्मद अली ने उन्हें गाने से रोक दिया और तर्क दिया की इस्लाम में संगीत वर्जित है इसलिए वे इसे गाने की अनुमति नहीं देंगे | मौलवी यह भूल गए की वे इस्लामी समागम में नहीं आयेथे | मौलवी के इस आचरण से सभा सन्न रह गयी लेकिन पलुस्कर ने उन्हें याद दिलाया की जब अध्यक्षीय शोभा यात्रा निकाली गयी थी तब उसमें हुए गायन को उन्होंने कैसे सहन किया | मौलाना के पास इसका कोई जबाब नहीं था | पलुस्कर गीत गाते रहे और मौलवी सभा को छोड़ कर चले गए | फिर भी १९३७ तक इसे गाया जाता रहा| इसी वर्ष हुए प्रांतीय विधानसभाओं के चुनावों में कांग्रेस ने सात प्रांत जीत लिए | कांग्रेस ने विधानसभाओं की कार्यवाही अपनी परंपरा के अनुसार वन्दे मातरम से शुरू की तो मुस्लिम लीग ने खुल कर इसका विरोध किया और वाकआऊट किया | अक्टूबर१९३७ में कांग्रेस की बैठक होने वाली थी | मुस्लिम लीग ने इससे पहले ही अपना अधिवेशन बुला लिया और उसमें यह कह कर कांग्रेस की निंदा की कि उसने इस गैर इस्लामिक गीत को देश पर थोप दिया है | हिन्दू मुस्लिम एकता के दिवास्वप्न देखने वाली कांग्रेस आखिर वैक फुट पर आ गयी | उसने इस गीत के पहले दो अंतरों को स्वीकार कर शेष को निकाल दिया | मुस्लिम लीग का क्रोध इतने से भी शांत नहीं हुआ और उसने इस गीत के चलते कांग्रेस को ही हिन्दू पार्टी घोषित कर यह प्रचार करना शुरू कर दिया की आजादी की आड़ में कांग्रेस हिन्दू राष्ट्र बनाना चाहती है | सब की नेता बनने की इच्छुक कांग्रेस की इससे चिंता बढ़ गयी और उसने इकबाल की गजल "सारे जहां से अच्छा" भी गाना शुरू कर दिया| इस पर भी इसका विरोध जारी रहा अलबत्ता कांग्रेस इसके ऊपरी दो पदों को अपनी सभाओं और शासित प्रांतों की विधानसभाओं में गाती रही | 14 अगस्त 1947 की रात संविधान सभा की पहली बैठक का प्रारंभ ‘वंदे मातरम’ के साथ और समापन ‘जन गण मन’ के साथ हुआ।15 अगस्त, 1947 को प्रातः 6:30 बजे आकाशवाणी से पंडित ओंकारनाथ ठाकुर का राग-देश में निबद्ध ‘वंदेमातरम’ के गायन का प्रसारण हुआ था। डॉ॰ राजेन्द्र प्रसाद ने संविधान सभा में २४ जनवरी १९५० में 'वन्दे मातरम्' को राष्ट्रगीत के रूप में अपनाने सम्बन्धी वक्तव्य पढ़ा जिसे स्वीकार कर लिया गया।2003 में बीबीसी वर्ल्ड सर्विस द्वारा आयोजित एक सर्वे में, जिसमें उस समय तक के सबसे मशहूर दस गीतों का चयन करने के लिए दुनिया भर से लगभग 7000 गीतों को चुना गया था और बीबीसी के अनुसार 155 देशों/द्वीप के लोगों ने इसमें मतदान किया था उसमें वन्दे मातरम् शीर्ष के 10 गीतों में दूसरे स्थान पर था! फिलवक्त इस पर विवाद जारी है और राजनीति भी और इसके आगे इस गीत को ले कर जो कुछ हुआ वह आप सभी सुधिजन बेहतर जानते हैं

Wednesday, February 8, 2017

छाया चारों ओर वसन्त

नाचे प्रकृति पहन कर पीली चुनर नई नई
छाया चारों ओर वसन्त , की सरसों फूल गयी 

कामदेव ने जाल रचे हैं , युवा मन भरमाये 
नीली झील सरीखी  आँखों  में वह डूबा जाये 
चढ़ा प्रेम का सब पर खुमार ,नशीली बयार वही 
छाया चारो और वसन्त की सरसों फूल गयी




Sunday, January 1, 2017

मुबारक हो नया साल

रमुआ को होरी को
कल्लू को डोरी को
मुबारक हो नया साल

मुबारक तो पिछला  भी था
मगर कई घाव दे गया
सादे से जीवन में
सौ घुमाव दे गया

तो रानी को महरी को
लुटी गुलदुपहरी को
मुबारक हो नया साल


सपने पहले भी थे
लेकिन सब बिखर गए
स्वप्न भंग होते ही
 जानें वे किधर गए 

तो छप्पर को छानी को
असफल कहानी को
मुबारक हो नया साल

विद्वान हैं हम

उत्तरों को प्रश्न में ढाला
और उस पर वहम यह पाला 
कि विद्वान हैं हम
स्वयं को तट पर खड़ा करके
वहस शुचिता पर करी वर्षों
मगर शुचितावान जख्मों पर
मली  हमने  फिटकरी वर्षों

बेटियों को नरक में डाला
और उस पर बहम यह पाला
कि प्रज्ञावान हैं हम


Sunday, December 11, 2016

वो क्या शय है

वो क्या शय है
जो महफ़िल में दिलों को गुदगुदाता है
मगर जब रात आती है ग़मों में डूब जाता है
वो क्या शय है

वो क्या शय है
जो पीर की किताब पुख्ता है
घाव  इतने हैं की पोर पोर दुखता है
लेकिन जहां मिलता है
खुल के मुस्कराता है
गीत गाता है कभी कभी गजल गाता है
भीड़ में रह कर जो तन्हाई से ऊब जाता है
 वो क्या शय है ।

Saturday, December 3, 2016

अब तो केवल फेसबुकों पर मिलना होता है


बहुत दिनों  बाद एक सामाजिक सरोकार का गीत  प्रस्तुत है

जो पहले मिलने को हरदम रहते थे आतुर
अब तो केवल  फेसबुकों पर मिलना होता है

 रोज मिला करते थे, फिर भी घंटो  बतियाते
मिलते ही हम तुम दोनों फूलों से खिल जाते
मुरझाये फूलों का भी क्या खिलना होता है ?
अब तो केवल फेसबुकों पर मिलना होता है ।

 लाइक, डिसलाइक,  कमेंट तक सीमित बातें हैं
नई पोस्ट से जुड़े हुए सब रिश्ते नाते हैं
मन बेचारे को कर्सर सा हिलना होता है
उनसे अब तो फेसबुकों पर मिलना होता है

                     सुशील दीक्षित विचित्र