Wednesday, December 22, 2010

मेलजोल के लिए अभी तक ----

मेलजोल के लिए अभी तक |
जो भी पहल करी ,
वह बेमौत मारी

कई बार में चल कर ,
उनके घर भी हो आया |
वैसा नाचा उसने ,
जब जब जैसा फरमाया |
पर मन में था छेद ,
स्नेह की भरी न यूँ गगरी |

संबंधों की बना सीढ़ियाँ ,
चढ़ने में माहिर |
हर उड़ान वाले के पंख ,
कतरने में माहिर  |
मित्रो की महफ़िल में लगते ,
दुश्मन के खबरी |

घायल है विश्वास हमारा ,
मन भी है आहत |
बर्बादी की यार तुम्हारी ,
ज्यूँ की त्युं चाहत |
यश की समझ ढो रहे तुम ,
वह अपयश की गठरी |           
                     कवि सुशील दीक्षित विचित्र 
    
     

Sunday, December 5, 2010

बहुत दिनों के बाद याद आई है 

बहुत दिनों के बाद याद आई है ,
ढेरों ले उन्माद याद आई है |

याद कि जैसे हवा बदरिया ले आई है ,
या कि फूल  पर तितली इठलाई है |
याद कि जैसे जल से उछले सोंन मछरिया ,
याद कि जैसे नभ से किरन उतर आई है |
याद कि जैसे टेसू फूल उठें जंगल में ,
याद अचानक ढूंढ याद लाई है |  
बहुत दिनों के बाद याद आई है |

बहुत दिनों से जग के फेरे में उलझा था ,
बहुत दिनों से तेरे मेरे में उलझा था |
इतनी उलझन स्वयं उलझनें उलझ गयीं थीं ,
बहुत दिनों से सांप सपेरे में उलझा था |
उत्तर गमले में उगते यादों के जंगल , 
कहाँ करूँ फ़रियाद याद आई है |
बहुत दिनों के याद आई है | 
                कवि सुशील दीक्षित विचित्र