Thursday, November 25, 2010

तीन लघु गीत 
             
            (1)
उजली सी दीवारों पर 
भद्दे से इश्तहार हैं |

ईंट ईंट सिल्हाई है ,
दरकीं सब दीवारें हैं |
इंच इंच घाव हैं नए 
पोर पोर अंगारें हैं |

कौन किस की सहलाये चोट ,
सब के सब व्यंगकार हैं |  
उजली सी दीवारों पर ,
भद्दे  से इश्तहार हैं |

             (2)
चंदा के गलियारे में 
फिर दिन का खून हो गया 
कोई भी खलबली नहीं 
कोई भी सनसनी नहीं 

लोहे की द्रढ़ बग्घी में , 
सब कागज के घोड़े हैं |
सोंच रहा राष्ट्र सारथी , 
अब दौड़े अब दौड़े  हैं |
लेकिन वे दौड़ेंगे कैसे , 
गति से तो दुश्मनी रही |
         ( 3 ) 
खून रंगी सड़कों के ,
 निर्वसन किनारों पर , 
छाप दो इश्तहार 
आज बंद बाजार है ,
यह  शहर बीमार है |

उगती है बर्फ यहाँ 
आग नहीं पलती है 
सोनें की लंका में सोने की चलती है 
धोखा हैं छल हैं
सारे ये आश्वासन 
सुग्रीव की सांसों में वासना मचलती है 
कौन किसकी सुनता है ,
काल शीश धुनता है,
ईश   भी लाचार है |
यह शहर बीमार है |
             कवि सुशील  दीक्षित विचित्र 
        









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