Monday, January 20, 2014

पत्थर से यारी की

शीशमहल में रहने बालों क्यूँ पत्थर से यारी की
तुमने अपने मन में सोंचा होगा यह हुशियारी की ।
तुमने सोंचा होगा पत्थर छोटे और बड़े होते
तुमने सोंचा होगा पत्थर पत्थर में झगड़े होते
तुमने सोंचा होगा पत्थर आपस में हैं बटे  हुए
भेद भाव की  दीवारों  से  रहते हैं ये सटे हुए
तुमने सोंचा होगा पत्थर पत्थर से टकरा देंगे
शेष बचेंगे जो पत्थर दीवारों में चिनवा देंगे 
लेकिन भूल गए पत्थर जब अपनी पर आ जाते हैं
आक्रोशित हाथों में आकर महलों से टकराते हैं

Friday, January 17, 2014

तुमने भी बात ---


तुमने भी बात ---
जब तुम मदहोश हो गए ,
हम  भी खामोश हो गए ।
तुमने भी बात नहीं  की ,
हमने भी बात नहीं की ।

कोई भी बात नहीं थी ,
बातों में बात   चल  पड़ी ।
बातों ही बातों में यूँ ,
बातों कि चली फुलझड़ी ।
शापित सब जोश हो गए ,
सपने रूपोश हो गए |
हमने भी बात नहीं की,
तुमने भी बात नहीं की।

फिर भी है बात जरूरी
आगे जब बात चलेगी
बातें तब ही सुलझेंगी
तब ही तो बात बनेगी
शब्द शब्द रोष हो गए
बेमानी संतोष हो गए
तुमने भी बात  भी की ,
हमने भी बात नहीं की ।

तो आओ बात हम  करें
बातों का भूल भुलावा
वरना जीवन भर होगा
हमको  यह पछतावा
क्यूँ तुम मदहोश हो गए
क्यूँ  हम खामोश होगये
क्यूँ तुमने  बात नहीं  की ,
क्यूँ हमने बात नहीं की । 

व्यंग्य गीत

   
चलो पुराने सम्बन्धों को
घूरे पर फेंके ।

प्रगतिशीलता  का युग है
सब करना पड़ता है,
बदल बदल कर कन्धों को
सिर  रखना पड़ता है।
अकृतज्ञता के प्याले में पी कर मद कि मदिरा,
उस्तादों  को  पीटें ,     फूल  जमूरे  पर  फेंके ।
चलो   पुराने  सम्बन्धों  को   घूरे  पर  फेंके  ।


सम्बन्धों का  क्या है,
यह तो बनते रहते हैं।
वक्त जरूरत कि चलनी में,
छनते रहते हैं।
कबिरा को गरियाएं , आओ तुलसी को  कोसें ,                                                                                                 और व्यंग कि  कीचड़  थोड़ी सूरे पर फेंके  ।
चलो  पुराने सम्बन्धों को  घूरे पर फेंके । 

चुनाव के प्रेत

 ---- चुनाव के प्रेत ---- 
लोटा डोर समेत आ  गए  गांव  में ,
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में ।                                                                                                                      
लोकतंत्र  की  लाश ढो रहे
अपने कंधे पर।
राजनीति की  आढ़त वाले
निकले धंधे पर।
स्वर सब के सम्वेत  , आगये गाँव में
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में ।

अंदर से रंगीन बहुत है
ऊपर से सादे ।
ट्राली भर सपने लाये हैं
बुग्गी भर  वादे ।

चरने सुख का खेत आ गए गाँव में
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में
                            सुशील दीक्षित विचित्र