वो क्या शय है
जो महफ़िल में दिलों को गुदगुदाता है
मगर जब रात आती है ग़मों में डूब जाता है
वो क्या शय है
वो क्या शय है
जो पीर की किताब पुख्ता है
घाव इतने हैं की पोर पोर दुखता है
लेकिन जहां मिलता है
खुल के मुस्कराता है
गीत गाता है कभी कभी गजल गाता है
भीड़ में रह कर जो तन्हाई से ऊब जाता है
वो क्या शय है ।
जो महफ़िल में दिलों को गुदगुदाता है
मगर जब रात आती है ग़मों में डूब जाता है
वो क्या शय है
वो क्या शय है
जो पीर की किताब पुख्ता है
घाव इतने हैं की पोर पोर दुखता है
लेकिन जहां मिलता है
खुल के मुस्कराता है
गीत गाता है कभी कभी गजल गाता है
भीड़ में रह कर जो तन्हाई से ऊब जाता है
वो क्या शय है ।