Sunday, November 14, 2010

धर्मनिरपेक्षता की नंगी दुहाई     

आओ
धर्मनिरपेक्षता की नंगी दुहाई देकर
इतिहास की आँख में डंडा करे |

जो तिलक लगाते हैं 
चोटी रखते हैं 
जो विश्ववन्धुत्व के देखते हैं  ख्वाब
जो विश्व को देते रहे हैं हमेशा ज्ञान 
जो गढ़ते हैं  
उद्दांत भावना की मजबूत छेनी से 
ऐश्वर्यशाली भारत की तस्वीर 
घोर साम्प्रदायिक हैं, 
गाँधी के हत्यारे हैं , 
और जो रख रहे हैं एक और विभाजन की नींव
तोड़ रहे हैं समाज 
कुतर्को की कुल्हाडी से काट रहे हैं सभ्यता की तुलसी 
वे हमें जान से भी प्यारे हैं
फिर भले वे देश के हत्यारे हैं  

 आओ
 धर्मनिर्पेक्षता की  नंगी दुहाई दे कर
 सत्य की आंख में डंडा करे   
आओ, भेड़ो को बताएँ कि
कटना उनका कर्तव्य है 
इसलिए जिन्दा रहने की मांग करना 
साम्प्रदायिकता होगी ,
आओ , भेड़ो को पंचशील का पाठ पढ़ायें  
कि वे बहुसंख्यक हैं 
भेड़िये अल्पसंख्यक हैं 
इसलिए वे भेड़ियो का विशेष ध्यान रखें 
भेड़िये भले ही उनके बच्चो को खा जाएँ 
मगर भेड़ो को चाहिए 
कि भेड़ियों की धार्मिक भावना को ठेस न लगने पाए /
क्योंकि भेड़ों 
और भेड़ियों के बीच कुछ इस तरह का भाईचारा है 
कि भेड़िये भेड़ो के भाई हैं
भेड़ें भेड़ियों का चारा हैं /

 आओ,
 धर्म निरपेक्षता की पाखंडी दुहाई देकर 
लोकतंत्र की आँख में डंडा करें /
आओ भेड़ो को अहिंसा का महत्व समझाएं 
उन्हें पुरजोर ढंग से ज्ञान दें
कि भेड़िये यदि उनका संविधान नहीं मानते हैं तो इसमें भेड़ो का दोष हैं /
उन्हें भेड़ियों के सुर में सुर मिलाना था
और अपना संविधान भेड़ियों के अनुकूल बनाना था
जिसमे जंगल के हर संसाधन पर
हर सुविधा पर भेड़ियों का पहला और अंतिम अधिकार होता
और भेड़ो के पास जंगल बचाने के कर्त्तव्य का भार होता /
फिर भी भेड़ें यदि भेड़ियों के सींग मारती हैं
तो यह हिंसा होगी /
अलबत्ता भेड़िया उनके परिवार का एक सदस्य खाता है
और उसका पेट नहीं भरता
तो भेड़ों को उसके लिए दूसरे सदस्य का इन्तजाम करना होगा
भले ही भेड़ों का अस्तित्व मिट जाये
सहअस्तित्व की रक्षा के लिए उनको ही काम करना होगा /

                           कवि सुशील दीक्षित विचित्र     



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