Thursday, March 8, 2012


काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो 
मंहगाई में कजरी विसरी,भूले हंसी ठिठोली हो

खोया भैया चढो ताड़ पर, गुझियाँ भई अमोल 
एक अकेले कमवैया की ,जेबन माँ सउ झोल
फागुन की मस्ती सब उतरी ,चढ़ई न भंग की गोली हो 
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो 

गेहूं बेचि के करजा पाटो, पास बचो नहिं धेला
पड़ो कबीर गुमसुम घर मा,सूनो डारो मेला
जैसे के तैसे घर लइ आओ ,अपने पान तमोली हो
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो

ऊपर ऊपर डारि रहे रंग .अन्दर को मन कोरो
जगत भंवर मा हमई फांसि के डुको नन्द को छोरो
करइ नरेगा मा मजदूरी गोपी भोली हो
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो
सुशील विचित्र
 मित्रता के लिए धन्यवाद 


आप की पूरी सभी हों कामनाएं 
हम विधाता से सदा यह ही मनाएं 
जिन्दगी में रंग खुशियों के भरें 
आज होली पर यही शुभकामनाएं 

Monday, March 5, 2012

रोज रोज कोई दिल लगाना नहीं होता
दिलो के तार न छेड़े वो गाना नहीं होता
जन्म जन्मों का नाता जब रिसे रिश्ता तभी होता
पलों में टूट जाये जो वो याराना नहीं होता  

  

Sunday, March 4, 2012

एक  अधूरा गीत लिखा है
तुम आओ पूरा हो जाये
तृप्ति लिखा है , प्यास लिखा है
पतझर संग मधुमास लिखा है
दुःख की घनी बस्तियां लिख दीं
खुशियों को वनवास लिखा है
ऐसा चाह रहा कुछ लिखना
सदियों सदियों हर युग गाये

सुशील विचित्र 

Saturday, March 3, 2012

खुली हथेली पर सूरज रख वह निकला जबसे
स्याह अँधेरे तहखानों में कैद हुए तब से
जाम सुराही हाला साक़ी सावन की रातें
यह सब जिसको हासिल हो वह क्या मांगे रब से
हंस कर दर्द न पीना सीखा पीकर दर्द न मुस्काया
ऐसे  को  निष्काषित करदो इश्क के मकतब से

सुशील विचित्र 

Friday, March 2, 2012

मेरे अन्दर एक नदी ,फिर------


मेरे अन्दर एक नदी ,फिर
नदी किनारे मैं क्यों जाऊं


मुक्त कल्पना की आखों में , सौ सौ चित्र उतर आतें हैं
 उनसे बतियाओ तो उन में , रंग स्वयं ही भर जाते हैं
प्रकृति हमारी जब साथी है ,फिर क्यों गीत तुम्हारे गाऊं
मेरे अन्दर एक नदी ,फिर ---------------------

पूर्ण काम, निष्काम न कोई , यहाँ काम की थाह नहीं है
और काम से बच कर निकले ,ऐसी कोई राह नहीं  है
काम सभी के आना , फिर क्यूँ केवल काम तुम्हारे आऊं
मेरे अन्दर एक नदी , फिर , नदी किनारे मैं क्यूँ जाऊं
                                                             
                                                                 सुशील विचित्र