काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो
मंहगाई में कजरी विसरी,भूले हंसी ठिठोली हो
खोया भैया चढो ताड़ पर, गुझियाँ भई अमोल
एक अकेले कमवैया की ,जेबन माँ सउ झोल
फागुन की मस्ती सब उतरी ,चढ़ई न भंग की गोली हो
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो
गेहूं बेचि के करजा पाटो, पास बचो नहिं धेला
पड़ो कबीर गुमसुम घर मा,सूनो डारो मेला
जैसे के तैसे घर लइ आओ ,अपने पान तमोली हो
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो
ऊपर ऊपर डारि रहे रंग .अन्दर को मन कोरो
जगत भंवर मा हमई फांसि के डुको नन्द को छोरो
करइ नरेगा मा मजदूरी गोपी भोली हो
काहेकि होली ,काहेकि होली , काहेकि होली हो
सुशील विचित्र