घर से चिठिया एक आई है
घर से चिठिया एक आई है ,
अम्मा ने कुशल क्षेम मंगाई है |
लिखती हैं पाला सारी फसल लूट गया ,
इसी करण पारो का बंधा रिश्ता टूट गया |
श्यामा गाय अपनी अब दूध नहीं देती है ,
ऊपर से दूना चारा खा लेती है |
जीने की अब तो बस होती रश्म अदाई है|
घर से चिठिया एक आई है,
अम्मा ने कुशल- क्षेम मंगाई है |
बापू को दमा का ज्वार फिर चढ़ आया ,
पखवाड़ा बीत गया दाना तक नहीं खाया |
ऊपर से पीने को दूध नहीं मिलता है
अपना तो जीवन यह कण-कण कर गलता |
भेज देना लल्ला लिखी जो दवाई है |
घर से चिठिया एक आयी है |
अम्मा ने कुशल-क्षेम मंगाई है|
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
घर से चिठिया एक आई है ,
अम्मा ने कुशल क्षेम मंगाई है |
लिखती हैं पाला सारी फसल लूट गया ,
इसी करण पारो का बंधा रिश्ता टूट गया |
श्यामा गाय अपनी अब दूध नहीं देती है ,
ऊपर से दूना चारा खा लेती है |
जीने की अब तो बस होती रश्म अदाई है|
घर से चिठिया एक आई है,
अम्मा ने कुशल- क्षेम मंगाई है |
बापू को दमा का ज्वार फिर चढ़ आया ,
पखवाड़ा बीत गया दाना तक नहीं खाया |
ऊपर से पीने को दूध नहीं मिलता है
अपना तो जीवन यह कण-कण कर गलता |
भेज देना लल्ला लिखी जो दवाई है |
घर से चिठिया एक आयी है |
अम्मा ने कुशल-क्षेम मंगाई है|
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
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