Monday, November 15, 2010

sare kyon saj band hain

 हर कोई सो गया यहाँ
 सारे क्यों साज  बंद हैं
 लड़ने को काल  से चला
 कोई भी साथ नहीं है |
 अपने ही एकाकी सर पर
अपना ही हाथ नहीं हैं

कानों में बात का जहर
आखों में भरी धुंध है        

सारे क्यों साज बंद हैं

नफरतें दहेज़ में मिलीं
टूटन संग ब्याह हो गया
यादों की हाट जब लगी
सुख का परिवार खो गया

कैसे मैं गीत को लिखूं
बागी सब हुए छंद हैं
सारे क्यों साज बंद है |
 
                    कवि सुशील दीक्षित विचित्र 

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