हर कोई सो गया यहाँ
सारे क्यों साज बंद हैं
लड़ने को काल से चला
कोई भी साथ नहीं है |
अपने ही एकाकी सर पर
अपना ही हाथ नहीं हैं
कानों में बात का जहर
आखों में भरी धुंध है
सारे क्यों साज बंद हैं
नफरतें दहेज़ में मिलीं
टूटन संग ब्याह हो गया
यादों की हाट जब लगी
सुख का परिवार खो गया
कैसे मैं गीत को लिखूं
बागी सब हुए छंद हैं
सारे क्यों साज बंद है |
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
सारे क्यों साज बंद हैं
लड़ने को काल से चला
कोई भी साथ नहीं है |
अपने ही एकाकी सर पर
अपना ही हाथ नहीं हैं
कानों में बात का जहर
आखों में भरी धुंध है
सारे क्यों साज बंद हैं
नफरतें दहेज़ में मिलीं
टूटन संग ब्याह हो गया
यादों की हाट जब लगी
सुख का परिवार खो गया
कैसे मैं गीत को लिखूं
बागी सब हुए छंद हैं
सारे क्यों साज बंद है |
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
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