vicharprvah
Monday, April 2, 2012
लोकगीत वाले पनघट वीराने मंजर लगते हैं
फसलें जहां झूमती रहती , खेत वे बंजर लगते हैं
धीरे धीरे बाग़ कटे , तालाब पटे ,नदियाँ सूखीं
ककडी खीरे वाली बेलों में अब खंजर लगतें हैं
सुशील विचित्र
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