Friday, March 2, 2012

मेरे अन्दर एक नदी ,फिर------


मेरे अन्दर एक नदी ,फिर
नदी किनारे मैं क्यों जाऊं


मुक्त कल्पना की आखों में , सौ सौ चित्र उतर आतें हैं
 उनसे बतियाओ तो उन में , रंग स्वयं ही भर जाते हैं
प्रकृति हमारी जब साथी है ,फिर क्यों गीत तुम्हारे गाऊं
मेरे अन्दर एक नदी ,फिर ---------------------

पूर्ण काम, निष्काम न कोई , यहाँ काम की थाह नहीं है
और काम से बच कर निकले ,ऐसी कोई राह नहीं  है
काम सभी के आना , फिर क्यूँ केवल काम तुम्हारे आऊं
मेरे अन्दर एक नदी , फिर , नदी किनारे मैं क्यूँ जाऊं
                                                             
                                                                 सुशील विचित्र 

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