धुप अंधेरों मैं था खड़ा
चाह पाले कई चाह में
आस विश्वास की लौ जली
रोशनी हो गई राह में
नेह की चांदनी यूँ झरी
भीगता मन हमारा रहा
सेहरा सेहरा खिले फूल फिर,
वादियाँ गुनगुनानें लगीं
थक के ऊँघी नदी को हवा
लोरियां गा सुलाने लगीं
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