खुली हथेली पर सूरज रख वह निकला जबसे
स्याह अँधेरे तहखानों में कैद हुए तब से
जाम सुराही हाला साक़ी सावन की रातें
यह सब जिसको हासिल हो वह क्या मांगे रब से
हंस कर दर्द न पीना सीखा पीकर दर्द न मुस्काया
ऐसे को निष्काषित करदो इश्क के मकतब से
सुशील विचित्र
स्याह अँधेरे तहखानों में कैद हुए तब से
जाम सुराही हाला साक़ी सावन की रातें
यह सब जिसको हासिल हो वह क्या मांगे रब से
हंस कर दर्द न पीना सीखा पीकर दर्द न मुस्काया
ऐसे को निष्काषित करदो इश्क के मकतब से
सुशील विचित्र
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