Friday, April 1, 2016

                                             सनातन सभ्यता  में शिक्षा का बहुत महत्त्व है । सनातनियों के लिए शिक्षा का उदेश्य  जीविका  पाना नहीं वरन  अज्ञानता से छुटकारा और अंततः मोक्ष की प्राप्ति ही इसका लक्ष्य रहा । इसके चलते प्रारम्भ में शिक्षा का स्वरूप आध्यात्मिक था । ऋषि मुनियों के आश्रम शिक्षा के प्रारम्भिक  केंद्र थे। इन केंद्रों के दरवाजे सभी के लिए खुले थे । राम को अपने गुरु वशिष्ठ के आश्रम में और श्री कृष्ण को संदीपनि के आश्रम में शिक्षा  पाने के लिए जाना पड़ा था। अस्तु ।
                                               बताते  चलें की अयोध्या मनु वंशियों की प्रथम गद्दी थी और प्रतिष्ठान पुर चद्रंवंशियों का प्रथम नगर । मनु से राम तक और चन्द्रवंश के संस्थापक  बुद्ध से  यादव वंश के संस्थापक चंद्रवंशी  यदु तक तथा यदु से कृष्ण तक आते आते शिक्षा का स्वरूप बहुत बदल गया । बहुत काल तक शिक्षा को लेकर भारतीय मनीषी चिंतन मनन करते रहे और राम के काल तक आते आते यह केवल अध्यात्माधारित ही नहीं रह गयी बल्कि  आम जन से राज्य और राज्य से साम्राज्य के कल्याणार्थ सोपानों को भी शिक्षा से जोड़ा गया । राम को अध्यात्म के साथ राजनीति व प्रारम्भिक शस्त्र  की शिक्षा गुरु वशिष्ठ के आश्रम में मिली और और युद्ध कल की गहन शिक्षा उन्होंने विश्वामित्र के आश्रम में रह कर पायी थी । जब की कृष्ण ने सभी तरह की शिक्षा गुरु सांदीपनि के आश्रम में पाई । चक्र चलाने का ज्ञान भी उन्हें संदपनि से ही मिला था ।
                                              युधिष्ठिर काल से चाणक्य काल तक आते आते आते शिक्षा बहुआयामी हो गयी थी । अब तक यह  आश्रमों  से निकल कर छोटे विद्यालयों और महाविद्यालयों तक पहुँच गयी थी । सातवीं सदी में तक्षशिला विश्वविद्यालय की ख्याति सारे विश्व में थी ।











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