नहीं अगर हरियाली होगी ,
यह जीवन क्या जीवन होगा ?
बोलो कहाँ पड़ेंगे झूले , कहाँ बितायेंगे दोपहरी ?
बिना बृक्ष के प्रातः गूंगी ,सब होंगी संध्याएं बहरी
पृथ्वी नंगी हो जायेगी, दुनियाँ भूखी मर जाएगी
तब हर पानी वाली बदली, अपने अपने घर जाएगी
फिर अकाल की धूल उड़ेगी , मरघट जैसा उपवन होगा
नहीं अगर हरियाली होगी ,यह जीवन क्या जीवन होगा॥
कैसे डोलेगी पुरवाई , कैसे पछुवा तान भरेगा
शहर गांव गलियारा कूंचा , सब कुछ रेगिस्तान बनेगा
जहां भटकती हुई जिंदगी , ताप देख पगला जाएगी
भूलेगी मल्हार की मस्ती , अपने पर झुंझला जाएगी
बिना वृक्ष संसार हमारा
जलता घुलता कण कण होगा ।
नहीं अगर हरियाली होगी ,
यह जीवन क्या जीवन होगा ॥
सुशील दीक्षित विचित्र
यह जीवन क्या जीवन होगा ?
बोलो कहाँ पड़ेंगे झूले , कहाँ बितायेंगे दोपहरी ?
बिना बृक्ष के प्रातः गूंगी ,सब होंगी संध्याएं बहरी
पृथ्वी नंगी हो जायेगी, दुनियाँ भूखी मर जाएगी
तब हर पानी वाली बदली, अपने अपने घर जाएगी
फिर अकाल की धूल उड़ेगी , मरघट जैसा उपवन होगा
नहीं अगर हरियाली होगी ,यह जीवन क्या जीवन होगा॥
कैसे डोलेगी पुरवाई , कैसे पछुवा तान भरेगा
शहर गांव गलियारा कूंचा , सब कुछ रेगिस्तान बनेगा
जहां भटकती हुई जिंदगी , ताप देख पगला जाएगी
भूलेगी मल्हार की मस्ती , अपने पर झुंझला जाएगी
बिना वृक्ष संसार हमारा
जलता घुलता कण कण होगा ।
नहीं अगर हरियाली होगी ,
यह जीवन क्या जीवन होगा ॥
सुशील दीक्षित विचित्र
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