बहुत दिनों बाद एक सामाजिक सरोकार का गीत प्रस्तुत है
जो पहले मिलने को हरदम रहते थे आतुर
अब तो केवल फेसबुकों पर मिलना होता है
रोज मिला करते थे, फिर भी घंटो बतियाते
मिलते ही हम तुम दोनों फूलों से खिल जाते
मुरझाये फूलों का भी क्या खिलना होता है ?
अब तो केवल फेसबुकों पर मिलना होता है ।
लाइक, डिसलाइक, कमेंट तक सीमित बातें हैं
नई पोस्ट से जुड़े हुए सब रिश्ते नाते हैं
मन बेचारे को कर्सर सा हिलना होता है
उनसे अब तो फेसबुकों पर मिलना होता है
सुशील दीक्षित विचित्र
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