चलो पुराने सम्बन्धों को
घूरे पर फेंके ।
प्रगतिशीलता का युग है
सब करना पड़ता है,
बदल बदल कर कन्धों को
सिर रखना पड़ता है।
अकृतज्ञता के प्याले में पी कर मद कि मदिरा,
उस्तादों को पीटें , फूल जमूरे पर फेंके ।
चलो पुराने सम्बन्धों को घूरे पर फेंके ।
सम्बन्धों का क्या है,
यह तो बनते रहते हैं।
वक्त जरूरत कि चलनी में,
छनते रहते हैं।
कबिरा को गरियाएं , आओ तुलसी को कोसें , और व्यंग कि कीचड़ थोड़ी सूरे पर फेंके ।
चलो पुराने सम्बन्धों को घूरे पर फेंके ।
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