---- चुनाव के प्रेत ----
लोटा डोर समेत आ गए गांव में ,
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में ।
लोकतंत्र की लाश ढो रहे
अपने कंधे पर।
राजनीति की आढ़त वाले
निकले धंधे पर।
स्वर सब के सम्वेत , आगये गाँव में
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में ।
अंदर से रंगीन बहुत है
ऊपर से सादे ।
ट्राली भर सपने लाये हैं
बुग्गी भर वादे ।
चरने सुख का खेत आ गए गाँव में
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में
सुशील दीक्षित विचित्र
लोटा डोर समेत आ गए गांव में ,
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में ।
लोकतंत्र की लाश ढो रहे
अपने कंधे पर।
राजनीति की आढ़त वाले
निकले धंधे पर।
स्वर सब के सम्वेत , आगये गाँव में
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में ।
अंदर से रंगीन बहुत है
ऊपर से सादे ।
ट्राली भर सपने लाये हैं
बुग्गी भर वादे ।
चरने सुख का खेत आ गए गाँव में
फिर चुनाव के प्रेत आ गए गाँव में
सुशील दीक्षित विचित्र
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