मेलजोल के लिए अभी तक ----
मेलजोल के लिए अभी तक |
जो भी पहल करी ,
वह बेमौत मारी
कई बार में चल कर ,
उनके घर भी हो आया |
वैसा नाचा उसने ,
जब जब जैसा फरमाया |
पर मन में था छेद ,
स्नेह की भरी न यूँ गगरी |
संबंधों की बना सीढ़ियाँ ,
चढ़ने में माहिर |
हर उड़ान वाले के पंख ,
कतरने में माहिर |
मित्रो की महफ़िल में लगते ,
दुश्मन के खबरी |
घायल है विश्वास हमारा ,
मन भी है आहत |
बर्बादी की यार तुम्हारी ,
ज्यूँ की त्युं चाहत |
यश की समझ ढो रहे तुम ,
वह अपयश की गठरी |
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
मेलजोल के लिए अभी तक |
जो भी पहल करी ,
वह बेमौत मारी
कई बार में चल कर ,
उनके घर भी हो आया |
वैसा नाचा उसने ,
जब जब जैसा फरमाया |
पर मन में था छेद ,
स्नेह की भरी न यूँ गगरी |
संबंधों की बना सीढ़ियाँ ,
चढ़ने में माहिर |
हर उड़ान वाले के पंख ,
कतरने में माहिर |
मित्रो की महफ़िल में लगते ,
दुश्मन के खबरी |
घायल है विश्वास हमारा ,
मन भी है आहत |
बर्बादी की यार तुम्हारी ,
ज्यूँ की त्युं चाहत |
यश की समझ ढो रहे तुम ,
वह अपयश की गठरी |
कवि सुशील दीक्षित विचित्र
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