Wednesday, December 22, 2010

मेलजोल के लिए अभी तक ----

मेलजोल के लिए अभी तक |
जो भी पहल करी ,
वह बेमौत मारी

कई बार में चल कर ,
उनके घर भी हो आया |
वैसा नाचा उसने ,
जब जब जैसा फरमाया |
पर मन में था छेद ,
स्नेह की भरी न यूँ गगरी |

संबंधों की बना सीढ़ियाँ ,
चढ़ने में माहिर |
हर उड़ान वाले के पंख ,
कतरने में माहिर  |
मित्रो की महफ़िल में लगते ,
दुश्मन के खबरी |

घायल है विश्वास हमारा ,
मन भी है आहत |
बर्बादी की यार तुम्हारी ,
ज्यूँ की त्युं चाहत |
यश की समझ ढो रहे तुम ,
वह अपयश की गठरी |           
                     कवि सुशील दीक्षित विचित्र 
    
     

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